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भूदान डायरी; विनोबा विचार प्रवाह : अहिंसा की आबरू खतरे में है

अगर हम देश का संरक्षण सशस्त्र सेनाओं पर छोड़ दे रहे हैं और शांति सेना का काम नहीं कर रहे हैं तो सर्वोदय और अहिंसा की आबरू खतरे में है, इसीलिए बाबा आजकल शांतिसेना की बात पर अधिक जोर देने लगे हैं.

अक्सर माना गया है कि बीमारी में अगर मनुष्य सोचता रहे, तो उसका चिंतन दुर्बल रहता है, लेकिन बाबा ने बीमारी की हालत में भी चिंतन में बहुत ज्यादा ताकत पाई है। बाबा एक माह तक बहुत बीमार रहे, इस बीमारी में भी बाबा ने सोचा कि शांतिसेना की स्थापना करनी है। यह सेना निरंतर घूमती रहकर लोगों की सेवा करे, लोगों पर नैतिक असर डालती रहे। हिंसा को कभी आगे आने का मौका न दे। पांच हजार व्यक्तियों पर एक कार्यकर्ता हो। इन कार्यकर्ताओं को अच्छी तालीम देनी होगी। इन्हें समझाना होगा कि हमें सत्ता मिटानी है। बाबा निरंतर कहते थे कि हमें सरकार को समाप्त करना है। हमारे कार्य में सरकार कुछ मदद बीच-बीच में देगी तो ले भी लेंगे, लेकिन हमारा अंतिम लक्ष्य सरकार को समाप्त करने का है। लोग ही अपने त्राता बनें। लोक कार्य में डिफेंस अर्थात रक्षण जरूरी है। अगर यह काम न किया तो लोग अनाथ बन जायेंगे, इसलिए शांतिसेना को यह रक्षण का काम करना चाहिए। वहां शांति भंग न हो यह ध्यान देना होगा। शांति सेना नित्य सेवा का काम करेगी, परंतु विशेष अवसर पर वह शांति का, अशांति शमन का काम करेगी।

 बाबा कहते थे कि शांतिसेना बनाने की इच्छा तो बापू की थी। उसके लिए कोशिश भी हुई थी, लेकिन साथी कमजोर पड़े, वह काम नहीं हो सका। महापुरुषों की आत्मा शरीर में रहते हुए जितना काम करती है, उससे ज्यादा काम  शरीर  से मुक्त होने पर करती है, इसलिए गांधीजी के रहते हुए जितना काम हुआ उससे ज्यादा काम आज हो रहा है। बापू ही शांति सेना के सेनापति और प्रथम  सैनिक भी थे। दोनो नातों से अपना काम पूरा करके वे चले गए।   

बाबा ने उठाया तो भूमि का मसला है, लेकिन असल में बाबा को हृदय परिवर्तन की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना है। जिस दिन शांतिसेना में ऐसे सेवक हो जायेंगे, जो अखिल मानव समाज की सेवा करने को तैयार हो जायेंगे, उस दिन से समाज में हिंसात्मक शक्ति ऊपर नहीं उठ सकेगी। केरल में बाबा की यात्रा चल रही थी, तब शांतिसेना की स्थापना हुई। उड़ीसा और तमिलनाडु में ग्रामदान और केरल में ग्रामदान से आगे बढ़कर शांतिसेना की स्थापना हुई। बाबा कहते थे कि शांतिसेना बनाने की इच्छा तो बापू की थी। उसके लिए कोशिश भी हुई थी, लेकिन साथी कमजोर पड़े, वह काम नहीं हो सका। महापुरुषों की आत्मा शरीर में रहते हुए जितना काम करती है, उससे ज्यादा काम  शरीर  से मुक्त होने पर करती है, इसलिए गांधीजी के रहते हुए जितना काम हुआ उससे ज्यादा काम आज हो रहा है। बापू ही शांति सेना के सेनापति और प्रथम  सैनिक भी थे। दोनो नातों से अपना काम पूरा करके वे चले गए। संतों ने भी ऐसी सेना बनाई थी। बाबा तो शांति सैनिक के रूप में तेलंगाना में ही शामिल हुए थे। अगर अहिंसा के जरिए आज देश में शांति स्थापना नहीं होती है, तो समझिये सर्वोदय खतरे में है। ग्रामदान से हमारा क्रेडिट कुछ तो बढ़ा है, पर सर्वोदय वाले हवा में नहीं, जमीन पर काम करते हैं, ऐसा विश्वास भी सबमें आना चाहिए। ग्रामदान से आर्थिक सवाल हल हो सकते हैं, इतना विश्वास अब सर्वोदय के लिए हो रहा है, लेकिन सर्वोदय की कुल की कुल इज्जत खतरे में है और तब वह मृगजल ही साबित होगा, अगर हम देश का संरक्षण सेना पर ही छोड़ दे रहे हैं तो. अहिंसा की भी आबरू खतरे में है, इसीलिए बाबा शांतिसेना की बात कहने लगे हैं।

-रमेश भइया

Co Editor Sarvodaya Jagat

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