क्रांति के तरीकों में क्रांति और आश्रम व्यवस्था

गांधी जी ने अहिंसक क्रांति के कई आयामों को विकसित किया। उसमें एक महत्त्वपूर्ण आयाम क्रांति के तरीके में क्रांति का आयाम है। गांधी जी ने क्रांति के तरीकों में क्रांति लाने की जो पद्धति विकसित की, उसमें माध्यम में ही लक्ष्य पूर्ति की संभावना थी। अहिंसक क्रांति के लिए गांधी जी ने जिन विधाओं का आविष्कार किया, वे हैं – सत्याग्रह, वैकल्पिक रचना के कार्यक्रम एवं आश्रम निर्माण।


गांधी जी द्वारा बनाये गये आश्रम, लोकसत्ता एवं स्वराज्य प्रेरित लोक समुदाय निर्माण के केन्द्र थे। ये आश्रम लोकसत्ता निर्माण के लिए संघर्षरत सत्याग्रहियों एवं स्वराज्य के लिए वैकल्भ्पिक रचना के काम से जुड़े कार्यकर्ताओं को सामुदायिक जीवन में लाकर, उनमें आत्मबल विकसित करने तथा ऊर्जा से भरने के केन्द्र के रूप में विकसित हुए। परिवर्तनकारी अहिंसक शक्तियों के सामूहिक साधना के केन्द्र के रूप में इन आश्रमों का विकास हुआ। गांधी जी ने कुल सात आश्रम बनाये, जिनमें से दो दक्षिण अफ्रीका में तथा पांच भारत में थे। इन आश्रमों में सभी प्रकार की जातियों, वर्गों, सम्प्रदायों, भाषाओं, क्षेत्रों एवं पेशों के लोग शामिल हुए। वहां ऊंच-नीच या किसी प्रकार का भेदभाव नहीं था।


गांधी जी ने अधिकांश आश्रमों को शहरों से दूर बनाया। शहरों से दूर इन आश्रमों को स्थापित कर, गांधी जी ने धीरे-धीरे, स्वयं को पूंजीवादी संस्कारों वाली एवं शहरवादी जीवन शैली से मुक्त कर लिया। गांधी जी के सार्वजनिक जीवन के केन्द्र, पूंजीवादी या नगरवादी व्यवस्था के बाहर बनते गये। ‘‘बड़े नगरों में धूर्तों की टोलियां एवं वेश्याओं की गलियां विकसित होंगी।’’ कृत्रिम तरह से बसाये गये शहर, प्रकृति विरोधी तथा शोषण व दोहन के केन्द्र बनते गये थे। गांधी जी ने गांव में स्वाभाविक, अकृत्रिम एवं प्रकृति के साथ सहजीवी संबंध वाले समुदाय का दर्शन किया था। गांधी जी द्वारा विकसित किये गये आश्रम बहुत हद तक पूंजीवादी बाजार के दखल व दायरे से मुक्त रखे गये। आश्रम ग्राम स्वराज्य का मॉडल प्रतिरूप बन सकें, यह प्रयास निरन्तर चलता रहा।


आश्रमों का एक अन्य पहलू था – शरीरश्रम की निष्ठा स्थापित करना। ये आश्रम जैसे आत्मबल साधना एवं ज्ञान साधना के केन्द्र बने, वैसे ही वे श्रम साधना के भी केन्द्र बने। शरीर श्रम की साधना एवं प्रतिष्ठा के माध्यम से गांधी जी ने श्रम के शोषण के सभी प्रकार की व्यवस्थाओं / संस्थाओं को नकार दिया था – चाहे वह वर्ण व्यवस्था प्रेरित हो, सामंती व्यवस्था आधारित हो या पूंजीवादी व्यवस्था में निहित हो।


शरीर श्रम प्रतिष्ठा का एक अन्य पक्ष यह था कि इसके माध्यम से उत्पादक श्रमिकों की निर्णय लेने की स्वायत्तता का विकास होगा। श्रम का काम करने वालों के योजना बनाने के अधिकार एवं निर्णय लेने के अधिकार को आश्रमों में स्थापित किया गया। यहां प्रबंधक एवं कार्यकर्ता के भिन्न वर्ग नहीं थे। वस्तुत: ये आश्रम लोक/श्रमिक की सत्ता के अपहरण की प्रक्रिया को उलट कर, लोक/उत्पादक श्रमिक की सत्ता लोक में पुन: स्थापित करने के मॉडल बन गये। लोक की सत्ता का निर्माण ऐसे लोक समुदायों के विकास से ही संभव था, जहां श्रेणीबद्धता न हो। आश्रमों के प्रबंध के नये तरीके विकसित कर, गांधी जी ने केन्द्रीकृत, श्रेणीबद्ध प्रबंधन व्यवस्था का भी विकल्प प्रस्तुत किया।


इस प्रकार हिंसा की सत्ता एवं पूंजीवाद के विकल्प के रूप में उन्होंने जो सूत्र विकसित किये थे, उनके आधार पर जीवन जीने की कला इन आश्रमों में विकसित की गयी। गांधी जी के आश्रमों में सत्याग्रही एवं रचनात्मक कार्यकर्ता अपने परिवार के साथ रहते थे। विभिन्न पृष्ठभूमि से आये ये परिवार एक समुदाय का निर्माण करते थे। समुदाय परिवार का विस्तार है, इस रूप में समुदाय का मॉडल विकसित हुआ। यहां एक भोजनशाला होती थी। बुनियादी स्तर पर यह लोकतांत्रिक सहजीवन का प्रयोग था। नये समाज के आदर्श रूप समुदाय का निर्माण तथा आदर्श व्यक्ति का निर्माण – दोनों का प्रयोग इन आश्रमों में निरन्तर क्रियाशील रहता था।


इस प्रकार आश्रमों के माध्यम से गांधी जी ने लोक समुदाय को पुनर्जीवित करने का अभियान चलाया। एक ऐसे लोक समुदाय का निर्माण, जहां प्रत्यक्ष एवं संस्थागत (व्यवस्थागत) दोनों तरह की हिंसा का निषेध हो। हिंसा जिन भाव ऊर्जाओं पर टिकी रहती हैं, वे हैं आक्रामकता, क्रोध, लोभ, मोह तथा व्यक्तियों, वस्तुओं व संसाधनों पर नियंत्रण रखने की इच्छा। दूसरी ओर अहिंसा जिन भाव ऊर्जाओं पर टिकती है, वे हैं प्रेम, करुणा, अस्तेय, अपरिग्रह, कष्ट सहन, सहभागिता आदि। आश्रम इन्हीं भाव ऊर्जाओं को जागृत करने व विस्तारित करने के केन्द्र बने। दक्षिण अफ्रीका में भी और भारत में भी सत्याग्रह में महिलाओं की बड़ी भागीदारी का एक कारण, आश्रम जीवन में उनके व्यक्तित्व में अहिंसक शक्ति का निखार आना था। महिलाओं में यूं भी अहिंसामूलक भाव-ऊर्जाएं सहज रूप से प्रकट होती है।


आश्रम अहिंसक समाज के विचार को मूर्त्तरूप देने की प्रयोग स्थली थे। वे आधुनिक शैतानी सभ्यता का निषेध करने तथा उनका विकल्प देने के अभियान के केन्द्र थे। इन्हें म्यूजियम या आधुनिक स्मारक में तब्दील करना, गांधीजी के आश्रम के विचार की हत्या होगी।

-बिमल कुमार

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