11 सितंबर : विनोबा जयंती यह एक गलत ख्याल है कि दु:ख मिट जायेंगे तो चित्त प्रसन्न होगा। चित्त प्रसन्न होता है, तब दु:ख मिट जाता है। चित्त की प्रसन्नता किसी बाहरी कार्यक्रम पर निर्भर नहीं। यदि बाहर के किसी कार्यक्रम पर वह निर्भर हो, तो कार्यक्रम बदल जाने पर […]

सेना के जवान खाना-पीना सब साथ करते हैं, लेकिन ईश्वर का नाम लेने का मौका आया, तो सब अलग हो जाते हैं। अपनी-अपनी अलग प्रार्थना करते हैं। यानी ईश्वर एक अलग करने वाला तत्त्व हो गया। पर इसमें ईश्वर की बड़ी निन्दा है। भक्ति-मार्ग में कभी-कभी भजन नशे की तरह […]

आत्मा में संकल्प-शक्ति निहित है। आत्मा की व्याख्या है, संकल्प का अधिष्ठान। जिससे स्फूर्ति मिले, वही आत्मा है। शुभ संकल्प बनता नहीं, इसलिए आत्मा की संकल्प-शक्ति प्रकट नहीं होती। आत्मा की संकल्प-शक्ति के प्रकाशन के लिए हम प्रार्थना करते हैं। व्यापक अनुभव से ईश्वर-सम्पर्क हिन्दुस्तान के लोग तो भावुक होते […]

सर्वधर्म समभाव के पीछे जो सभी जीवों को अपना लेने का भाव है, वह हमें सभी मनुष्यों की समानता से आगे सभी जीवों की एकता तक ले जाता है। वास्तव में प्रकृति की एकता का जो आध्यात्मिक मूल्य और वैज्ञानिक अनुसंधान है, उसी में से मनुष्य समाज के लिए सर्वधर्म […]

यह देह साध्य नहीं, साधन है। यदि हमारा यह भाव दृढ़ हो जाये, तो फिर शरीर का जो वृथा आडंबर रचा जाता है, वह न रहेगा। जीवन हमें निराले ही ढंग का दीखने लगेगा। फिर इस देह को सजाने में हमें गौरव का अनुभव नहीं होगा। मैं देह ही हूँ, […]

हमारे आध्यात्मिक साहित्य में कर्म योग, ज्ञान योग, ध्यान योग, आदि शब्द मिलते हैं। यहां नया ही शब्द मिला है_ मनोधी _ योग:। उसका एक अर्थ है मन और बुद्धि का योग मन और बुद्धि एक होना बड़ी बात है। अक्सर देखा जाता है , मन एक बात कहता है, […]

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