देश का जुनून है या आधी रात का सपना?

देश केसे बनता है? केसे कायम रहता है? क्या ठंडे सोच-विचार से, हित-स्वार्थों की चतुर समझदारी से, राष्ट्रीयता की सही वैज्ञानिक समझ से देश जन्म लेता और पनपता है? या देश एक जुनून है, आधी रात में देखा गया तर्कातीत सपना है, भावनाओं का अंधड़ है, इतिहास की भट्ठियों में उबाली गयी और जातीय स्मृतियों के सिलिंडरों में सदियों तक सिझाई गयी मनपसंद शराब है? या दोनों ही बातें गलत हैं और देश, विवेक और आवेश की एक संयुक्त संतान है, जिसके बारे में हम कभी यह नहीं जान सवेंâगे कि उसे कितना आवेश ने गढ़ा है और कितना विवेक ने, कितना दोपहर के सृजन ने गढ़ा है और कितना आधी रात के सपने ने? क्या देश एक सौदा है, जो बनियों की तरह हिसाब लगाकर किया जाता है? या वह प्रेम है, जो हो जाता है? देश एक तर्वâ है या एक मिथक है? आधी रात को हिन्दुस्तान के लोग सपने में क्या देखें, इसका प्रबंध क्या कोई कर सकता है? 1947 में भारत का बंटवारा इसलिए नहीं हुआ कि भारत की नियति के बारे में हिन्दुओं और मुसलमानों के पास अलग ठंडे तर्वâ थे और वैज्ञानिक दृष्टियां थीं। यह इसलिए हुआ कि दोनों कौमों के जुनून अलग होते गये। आधी रात के सपने अलग होते गये और उनके मिथक वक्र और विपरीत बनते गये। गोखले और जिन्ना जब तक सूट और टाई पहनते थे, तब तक हिन्दू और मुसलमान की साझा संस्कृति में कोई दरार नहीं पड़ी। लेकिन गांधी जब घुटनों तक की धोती पहनकर गांव-गांव जाने लगे और आश्रम के माहौल में रहने लगे, अहिंसा, सत्य, अस्तेय आदि के ग्यारह-सूत्री नियम बताने लगे, अनशन करने लगे, बकरी का दूध पीने लगे और रामराज्य का जिक्र करने लगे, तो दरार पड़ गयी।


अब तक कुछ हिन्दुस्तानियों को यदि इस बात का अफसोस है कि सूट-टाई के आंग्ल संवैधानिक तरीकों से भारत ने आजादी की लड़ाई क्यों नहीं लड़ी, तो कुछ को इस बात का अफसोस है कि गरीब लोगों के बीच धर्मद्रोही वर्ग चेतना जगाकर, वर्ग संघर्ष के वैज्ञानिक नियमों से हमने अपना रास्ता क्यों नहीं चुना। काश, हम गोखले और जिन्ना के रास्ते चले होते! काश, हमने एमएन राय और डांगे को नेता माना होता। ये सब उपलब्ध थे, लेकिन हिन्दुस्तान उनके पीछे नहीं चला, क्योंकि पूरे पहाड़ में घोड़ा उसी चट्टान को चाटता है, जिसमें नमक होता है। यह भारत का खाद्य-अखाद्य बोध है कि उसने गांधी को नेता माना, दूसरे को नहीं। और भारत के भक्त कवियों की तरह यदि गांधी इस देश के अवचेतन को आंदोलित नहीं करते, यदि वे यहां एक गहरी हूक पैदा नहीं करते, तो भारत में वह जन ऊर्जा पैदा ही नहीं होती, जिसने हमारी स्वाधीनता को 1947 में संभव बनाया। गांधी को छोड़ें और नेहरू की बात करें। नेहरू से ज्यादा धर्मनिरपेक्ष, विज्ञान का पक्षधर, आधुनिक चेतन नेता तो हिन्दुस्तान ने शायद ही इस सदी में पैदा किया हो, लेकिन यदि हम जवाहरलाल के जुनून की तलाश करें, तो हम क्या पाते हैं? हम पाते हैं कि यह शख्स भारत के एक-एक आदमी का चेहरा यह टटोलते हुए पढ़ रहा था कि उस पर भारतमाता की छाप कहां है? नेहरू ने गंगा के बारे में, हिमाचल के बारे में, भारत की मिट्टी के बारे में जो लिखा है, उसे जरा एक बार फिर पढ़िये। गंगा और हिमाचल का नाम सुनकर जो झनझनाहट नेहरू को होती थी, वह क्या एक हिन्दू प्रतिध्वनि थी? नेहरू ने अपने देश को सौंदर्य-प्रतीकों, प्रेरणा-प्रतीकों और स्मृति-प्रतीकों में देखा। इन सबने उन्हें बिजली दी। इस बिजली के बगैर कोई हिन्दुस्तान में केसे रह सकता है?

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