नेहरू जिंदा हैं…!

नेहरू को जो गाली दे, उसे बिना कांटों वाला गुलाब देकर शर्मिंदा करें. यह देखकर हमारे महबूब नेता जवाहरलाल नेहरू मंद-मंद मुस्काएँगे।

सरदार पटेल ने कहा था कि– “यह स्वाभाविक ही था कि स्वतंत्रता की अल्लसुबह के धुंधलके उजास में वे हमारे प्रकाशमान नेतृत्व बनें.” क्या आप जानते हैं सरदार पटेल ने यह किसके बारे में कहा था? पंडित जवाहरलाल नेहरू के बारे में.

वही जवाहरलाल नेहरू, जिन्हें आज सरदार पटेल का सबसे बड़ा दुश्मन बताया जाता है. आज अफ़वाहों और फेक न्यूज़ का दौर है, जिसमें जय-वीरू को भी एक दूसरे का पैदाइशी दुश्मन बता दिया जाए तो कोई बड़ी बात नहीं होगी. मानने वाले मान भी जाएंगे, मानते ही हैं. मानने के लिए बुद्धि या तर्क की ज़रूरत नहीं होती है, बस मान लिया जाता है.

नेहरू ने कहा कि जब लाखों लोग भूख से मर रहे हों, तब ईश्वर की बात करना बेमानी है. नेहरू तर्क पर बहुत ज़ोर देते थे. तर्क पर, राजनीतिक-ऐतिहासिक दृष्टि पर, पढ़ाई पर. आज के इस अतार्किक माहौल में नेहरू याद आएंगे, प्रासंगिक होते रहेंगे. एक खंडहर प्रासाद को नई नींव देकर सुंदर इमारत की सूरत दी नेहरू ने. उसे अपने तर्कों से, खूबियों से, मेहनत से सजाया. किसी वाद के वादी नहीं हुए, गुट-निरपेक्ष रहे, तीसरी दुनिया के नेता रहे.

गांधी ने नेहरू के बारे में कहा था कि यही है, जो मेरे बाद मेरी भाषा बोलेगा. नेहरू ने यह साबित किया. लेकिन नेहरू की पहचान महज़ गांधीवादी होने से बहुत आगे की थी. कहीं-न-कहीं नेहरू के कई मतभेद भी थे गांधी से, गांधीवादी नीतियों व गांधीवादी अर्थशास्त्र से. लेकिन नेहरू ने इन मतभेदों को अपमान की शक्ल नहीं दी. वह साबित करते रहे कि किसी सिद्धान्त की किस प्रकार अलग-अलग व्याख्याएं और विवेचनाएं भी काम ली जा सकती हैं. हर व्यक्ति अपना एक पक्ष चुनता है, नेहरू ने भी चुना, नेहरू का भी झुकाव था.

सुभाष चन्द्र बोस की बेटी अनिता बोस ने पिछले वर्ष एक टीवी चैनल पर कहा कि आज़ादी की लड़ाई के वक़्त कांग्रेस में दो ही बड़े वामपंथी नेता थे. एक सुभाष चन्द्र बोस, दूसरे जवाहरलाल नेहरू. मार्क्स, लेनिन को पढ़ा नेहरू ने, सोवियत गए, देखा, समझा और इस नतीजे पर पहुँचे कि भारत में समाजवाद वैसे नहीं आ सकता, जैसे सोवियत संघ में आया. इस मामले में वह गांधी के नज़दीक थे. गांधी भी मानते थे कि साम्यवाद को अगर भारत में आना होगा तो उसका भारतीयकरण होगा, तभी आ पाएगा. हालांकि जब नेहरू वर्ग-संघर्ष और वर्ग-युद्ध की हिमायत करने को हुए, तब गांधी ने उन्हें संभाला भी. कांग्रेस में नेहरू का वामपंथ की तरफ झुकाव था, सरदार पटेल का दक्षिणपंथ की तरफ, गांधी दोनों की बीच की कड़ी थे, उन्हें जोड़ते थे, संभालते और टटोलते थे.

बच्चों के बीच चाचा नेहरू

कहना गलत न होगा कि नेहरू की सिल्वरस्पूनिंग हुई, काफी बड़े और जाने-माने परिवार में पैदा हुए. ऐसा परिवार जो अगर अंग्रेजों की जी-हुज़ूरी करता तो जाने कितने ऐश-ओ-आराम और शांति से रहता, किसी चीज़ का उसे कोई फ़र्क़ न पड़ता. लेकिन जवाहरलाल नेहरू को फ़र्क़ पड़ता था, उनके पिता मोतीलाल नेहरू को भी. बेटा जवाहरलाल जेल में सोता तो पिता मोतीलाल भी अपने बड़े से घर में ज़मीन पर सोते, ताकि अपने बेटे के कष्टों को अनुभव कर सकें, उसके ज़मीनी हमदर्द बन सकें.

पैसे-रुपये, शोहरत किसी चीज़ की कमी नहीं थी नेहरू खानदान के पास. “दीवार” फ़िल्म के चर्चित डायलॉग की तरह कहें तो बिल्डिंग, प्रॉपर्टी, बैंक बैलेंस, बंगला, गाड़ी, यह सब था नेहरू के पास लेकिन नेहरू कूदे आज़ादी की लड़ाई में. आज़ादी के पवित्र अग्निकुंड में. कोट-पैंट और थ्री-पीस सूट से खादी पर आए. बंगले वाले नेहरू, वकील के बेटे नेहरू और खुद वकील नेहरू धीरे-धीरे जनता के नेहरू बनते चले गए, जेल के नेहरू, ज़मीन के नेहरू बनते चले गए.

नेहरू की सभी जेल-यात्राओं को मिला दें तो जीवन के लगभग दस वर्ष उन्होंने जेल में बिताए. दो प्रधानमंत्रियों के एक-एक कार्यकाल जितना समय. जो सरकारें नेहरू की आलोचना करती हैं, याद रखें कि उनके कार्यकाल से अधिक वर्ष तो नेहरू ने जेल में बिता दिए थे. सबकुछ हो आपके पास. लेकिन आप क्रांति व आंदोलन को ही अपना रास्ता बना लें. तब आप नेहरू हो जाते हैं. कहना आसान है, होना नहीं. कोई हो भी नहीं सकता. उन्होंने जैकेट पहनी तो जैकेट का नाम नेहरू जैकेट हो गया. हालाँकि आज भी जैकेट पहनकर लोग चाहते हैं कि जैकेट का नाम उन पर पड़ जाए. कुछ अतिउत्साही लोग नाम रख भी देते हैं.

नेहरू की किताबें पढ़ें, उनकी वसीयत पढ़ें. एक मुल्क़ को आज़ाद करने में अपना सब कुछ लगा देने वाले, आज़ादी के सूर्य की आभा बनने वाले, उसे संजोने वाले नेहरू को समझें. अपनी वसीयत में नेहरू लिखते हैं– “मेरी राख का ज़्यादा हिस्सा हवाई जहाज से ऊपर ले जाकर खेतों में बिखरा दिया जाए, वो खेत जहाँ हजारों मेहनतकश इंसान काम में लगे हैं, ताकि मेरे वजूद का हर ज़र्रा वतन की खाक़ में मिलकर एक हो जाए.”

नेहरू चाहते थे कि हर वयस्क को वोट देने का अधिकार मिले, इस बात पर बहुत लोगों ने उनका खूब विरोध किया. आरएसएस की पत्रिका “ऑर्गनाइजर” ने चेतावनी दी कि- नेहरू को आजीवन अपनी इस गलती का पछतावा करते हुए जीना पड़ेगा. लेकिन नेहरू तो ठहरे आन्दोलनजीवी, तो उन्होंने अपना फैसला लिया और 1952 में चुनाव के पार्ट रिजल्ट्स आये, जिसमें नेहरू के नेतृत्व में कांग्रेस पार्टी को बहुमत मिला.

पहले ही चुनाव में महिलाओं ने भी वोट दिया, जो पूरी दुनिया में एक क्रांतिकारी कदम था. तमाम अखबारों में प्रकाशित हुआ कि यह भारत के लोकतंत्र, यूनिवर्सल एडल्ट फ्रैंचाइज़ और नेहरू की दूरदर्शिता की जीत है. बकौल विंस्टन चर्चिल मनुष्य की दो सबसे बड़ी कमज़ोरियों- भय और घृणा पर विजय प्राप्त कर लेने वाले व्यक्ति नेहरू ही थे. नेहरू ने अपने अंदर का डर खत्म कर लिया था. और पूरे मुल्क़ के मन से डर हटा दिया था. मानना होगा कि यह गांधी की सोहबत की देन थी, जो जेल का भी डर मिटा देते थे.

नेहरू उन्मादी भीड़ में अकेले खड़े हो जाते थे और भीड़ का उन्माद थम जाता था. कोई चिल्लाता कि गांधी को मार दो तो नेहरू तनकर खड़े हो जाते कि कौन है, आओ पहले मुझे मारो. ये थे नेहरू. तनकर खड़े होने का नाम. उनकी गुलाबी छवि बनाकर हमने गलती भी की है. चाचा नेहरू और गुलाब वाले नेहरू के साथ-साथ वह एक स्टेट्समैन और डटकर खड़े होने वाले आंदोलनकारी नेहरू थे. अपनी पत्नी की याद में हमेशा जेब में गुलाब का फूल रखते थे. जैसा कि चे गेवारा ने कहा भी है कि “मैं इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि एक असल क्रांतिकारी प्रेम की महान भावनाओं से प्रेरित होता है.” नेहरू ऐसे ही क्रांतिकारी थे.

सुभाष चन्द्र बोस अपनी आज़ाद हिंद फौज की एक रेजिमेंट का नाम नेहरू के नाम पर रखते हैं, नेहरू से किताबें मांगते हैं. आज़ाद हिंद फौज का केस लड़ने के लिए नेहरू बरसों बाद अपना वकालत का कोट पहनते हैं. भगत सिंह कहते हैं कि युवाओं को बोस से अधिक नेहरू से प्रेरणा लेनी चाहिए, क्योंकि नेहरू के पास एक राजनीतिक दूरदृष्टि है. नेहरू का दिल इतना बड़ा है कि अपने धुर-विरोधियों को भी जगह देता है, श्यामाप्रसाद मुखर्जी जैसे जनसंघ के नेता को भी वह अपनी कैबिनेट में जगह देते हैं. “चाणक्य” के छद्मनाम से वह अखबारों में अपनी ही आलोचना लिखते हैं. जेल में बैठकर बिना किसी रेफरेंस और लाइब्रेरी के “डिस्कवरी ऑफ इंडिया” और “ग्लिम्प्सेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री” जैसी मोटी-मोटी किताबें लिख देते हैं.

कोई कितनी भी कोशिश कर ले नेहरू को गाली देते हुए नेहरू की ही नकल करने की, लेकिन नेहरू जैसा कभी बन नहीं सकेगा. नेहरू सिंगल-पीस थे जिसने देश को बनाने में अपना जी-जान लगाया. कला-विज्ञान हर क्षेत्र में देश को आगे ले जाना चाहा. गांधी ने उन्हें कहा कि तुम हिन्द के जवाहर बनो और वह हिन्द के जवाहर बन ही गए.

जब जवाहरलाल नेहरू मृत्यु से जूझ रहे थे. तब जाने-माने अख़बार “ब्लिट्ज़” के एक स्तम्भकार से कहा गया कि नेहरू कभी-भी मर सकते हैं, इसलिए जल्दी से अख़बार के लिए एक ख़बर लिखो. स्तम्भकार ने खुद को कमरे में अकेले बन्द कर लिया और नेहरू की मौत की हेडलाइन लिखने बैठे.

पहले उन्होंने लिखा- ‘नेहरू का निधन’
फिर उन्होंने बदल के लिखा- ‘नेहरू मर गए’
बाद में काटकर लिखा- ‘नेहरू नहीं रहे’
इसके बाद उन्होंने तीनों ही हेडलाइन्स को काट दिया और नए सिरे से लिखा–
“नेहरू ज़िंदा हैं..!” और यही हेडलाईन अख़बार में छपी.
नेहरू का एक विशाल व्यक्तित्व था. इतना बड़ा जिसके सामने उनसे चिढ़ने वाले बौने दिखते हैं. खुद बिना कुछ किए खाली बैठकर नेहरू की आलोचना करने वाले नेहरू के सामने ज़मीन पर रेंगते दिखाई देते हैं. खुद का ही आलोचक बन जाने वाले नेहरू की आलोचना करने के लिए भी आपको बहुत मेहनत करनी पड़ेगी. साहिर लुधियानवी और कैफ़ी आज़मी जैसे कम्युनिस्ट झुकाव रखने वाले शायरों ने नेहरू की आलोचना भी की है, लेकिन नेहरू के ही स्नेह और सम्मान में उन्होंने नज़्में भी लिखी हैं.
नेहरू के समक्ष तमाम चुनौतियाँ थीं एक बिखर चुके बरबाद मुल्क़ को संभालने के लिए. नेहरू ने संभाला, जब तक रहे. मिठास और बग़ावत पर मालिकाना हक़ रखने वाले नेहरू से सीखना है कि कैसे प्रेम, क्रांति, सद्भाव, सब्र, भलाई, नेकी इस पूरे संसार में फैलाई जा सकती है. डर खत्म करें, बाग़ी बनें. विनम्र भी बने रहें. प्रेम करें. तब नेहरू नहीं, पर नेहरू जैसा आप ज़रूर बन पाएँगे. इस राह पर आपको पराजय भी मिलेगी. आपको स्वीकारनी होगी.
बकौल रामधारी सिंह ‘दिनकर’–
“इतिहास को रोशनी अक्सर उन लोगों से मिलती है जो पुण्य की राह पर पराजित रहे. कृष्ण, अशोक, अकबर, गांधी, नेहरू ऐसे ही पराजित पुण्य के प्रतीक हैं.”
तो हम भी थोड़ी कोशिश करें. पराजित ही सही, लेकिन पुण्य के प्रतीक बनें. नेहरू को जो गाली दे, उसे बिना कांटों वाला गुलाब देकर शर्मिंदा करें. यह देखकर हमारे महबूब नेता जवाहरलाल नेहरू मंद-मंद मुस्काएँगे.

-आयुष चतुर्वेदी

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