राजनीति की उपज है आतंकवाद

आज विश्व में जो मुस्लिम आतंकवाद है, उसके मूल में इस्लाम नहीं मुस्लिम शासक वर्ग का एक तबका और साम्राज्यवादी शक्तियां हैं। इस्लाम तो 1500 वर्षों से है, लेकिन आतंकवाद मॉडर्न फेनोमेना है। मूलतः राजनीति की उपज है और उसको जमीन भी राजनीतिक कारणों से ही मिलती है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति के तहत कई देशों की सरकारें भी प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से आतंकवाद का समर्थन करती हैं। इसके कारण जनाधार कमजोर होने के बावजूद वे ताकतवर हो जाते हैं। उन्हें इन सरकारों के पक्षधर मीडिया का भी समर्थन मिलता है। इस्लाम, पैगंबर साहब के इंतकाल के बाद तत्कालीन घटनाक्रमों के कारण संस्थागत धर्म में तब्दील हो गया। इसके अलावा इस्लाम में कई आंदोलन हुए और इस्लाम की कई व्याख्याएं हुई। उनमें इस्लाम का एक वहाबी इन्टरप्रेटेशन है, जिससे आतंकवादी अपना खाद-पानी लेते है। ज्यादातर मुस्लिम देशों में अलोकतांत्रिक शासन है। वहां के संस्थागत इस्लाम के उलेमाओं का एक हिस्सा सरकार के समर्थन में इस्लाम की मनमानी व्याख्या भी करता रहता है। अगर वे देश आतंकवाद के किसी हिस्से का समर्थन कर रहे होते है, तो प्रकारांतर से उसका भी समर्थन इन उलेमाओं के द्वारा किया जाता है।


अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यवादी राजनीति आतंकवाद की जड़ में है। यह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मुस्लिम आईडेंटिटी की राजनीति है। इसमें मुस्लिम देशों के शासक वर्गों और साम्राज्यवादी ताकतों, दोनों का हित सधता है। आज राज्य की ताकत पहले से कई गुना बढ़ी हैं। इस ताकत को बढ़ाने में टेक्नोलॉजी की बड़ी भूमिका है। आतंकवादी भी इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। कुल मिलाकर आज राज्य अथवा राज्य समर्थित ताकतों के लिए जनसमर्थन का भ्रम पैदा करना पहले की तुलना में ज्यादा आसान है।


अमेरिका ने अफगानिस्तान में तालिबानियों को पाकिस्तानी बेस का इस्तेमाल कर रूस के खिलाफ खड़ा किया था। आज भी तालिबानियों को पाकिस्तान का समर्थन प्राप्त है। पाकिस्तान की अंतराष्ट्रीय राजनीतिक भूगोल में स्ट्रेटेजिक पोजीशन है, अमेरिका उसे छोड़ नहीं सकता है। कुछ मुस्लिम देशों का भी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष समर्थन तालिबानियों को प्राप्त है। जहां तक बर्बर हिंसा का सवाल है, आदिकालीन जन्मजात चेतना के संदर्भ से उपजी हिंसा बर्बर होती है, इसे साम्प्रदायिक, संकीर्ण व आधुनिक व साम्राज्यवादी ताकतें अपने हितों के लिए बार-बार संगठित करती हैं।


आधुनिक राज्य चाहे लोकतान्त्रिक हो या अलोकतांत्रिक, अपने हित में हिंसा को बढ़ावा देता है। उसका समर्थन सफेदपोश भी अलग-अलग कारणों से करते हैं। तालिबानियों को अफगानिस्तान की जनता का समर्थन नहीं है, इसमें कोई संदेह नहीं है। लेकिन वे वहां की जनता पर उक्त कारणों से हावी हो गये हैं।

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