कोठा अटारी शिव के मनहीं न भावे

सदियों पुराने मंदिरों और स्थापत्यों को बहुत सावधानी से हाथ लगाना चाहिए। उनमें उनकी आत्मा बसी होती है, उनमें उनकी ख़ुशबू बोलती होती है। आप उन्हें छूते हैं, और जादू ख़त्म हो जाता है। विशाल देवालयों के घंटी घड़ियालों में बस एक सन्नाटा बजता रह जाता है।

लोगों के मन में बसी धार्मिक आस्था के चुनावी भुगतान की योजना पर पिछले चार दशक से काम कर रहा एक राजनीतिक दल और संस्कृति की चादर ओढ़कर लगभग सदी भर से उसके लिए राजनीतिक जमीन बना रहा उसका मातृसंगठन, दोनों आजकल उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनावी फड़ पर बिसातें बिछाने में लाज हया त्यागकर लगे हुए हैं। जिस बनारस के कंकर कंकर में शंकर आदिकाल से बिराज रहे हैं, उस बनारस में राजनीति आदि विश्वेश्वर का धाम, लोक को अर्पण करने की हद तक गुजर गई और बनारस हक्का बक्का देखता रह गया। बनारस समझ ही नहीं पाया कि यह अपने धाम में युगों से विराजित शिव का लोकार्पण था या काशी में आदिकाल से स्थापित उनके धाम का लोकार्पण था?


का ले के शिव के मनाईं हो, शिव मानत नाहीं
पूड़ी,मिठाई शिव के मनहीं न भावे,
भांग धतूरा कहाँ पाईं हो, शिव मानत नाहीं


अपने शिव के लिए लोक आस्था की यह गूंज सुनिए, इन लरजते हुए शब्दों की भंगिमा पर गौर कीजिये। इन भावों की तरलता को महसूस कीजिये और अनुमान कीजिये कि शिव की अपने लोकमानस में व्याप्ति कैसी है!


हाथी औ घोड़ा शिव के मनहीं न भावे,
बसहा बैल कहाँ पाईं हो, शिव मानत नाहीं
शाला- दुशाला शिव के मनहीं न भावे,
मृगया के छाला कहाँ पाईं हो, शिव मानत नहीं


उस नैरेटिव पर ध्यान दें, जो लगातार गढ़ा जा रहा है और अमृत बताकर विष की तरह बांटा जा रहा है। राम का भव्य मंदिर, शिव का भव्य कारीडोर, भव्य प्रतिमा, भव्य छवि! और तुलना कीजिये अपने मन में बसी राम और शिव की अलौकिक उपस्थिति से। वन वन भटकते, राक्षसों का वध करते वल्कलधारी राम किसको भव्य दिखते हैं? गले मे सांप लटकाए कैलासवासी शिव की छवि किनकी आँखों को भव्य लगती है? राजस त्यागकर यती हुए इन दैव तत्वों में भव्यता की तलाश या उस दिशा में किया जाने वाला कोई भी प्रयास यह बताता है कि राम या शिव को जानने में हम कितने गरीब हैं! वे तो अपने अवतरण से ही लोकार्पित रहे हैं, बल्कि अवतरित ही हुए लोकार्पित होकर। वे महलों दुमहलों और कोठा अटारी की भव्यता में कब समाये!


कोठा अटारी शिव के मनहीं न भावे,
टुटही मड़ैया कहाँ पाईं हो, शिव मानत नाहीं


और अब बात बनारस की। बनारस अपनी निरंतरता में दुनिया के सबसे प्राचीन शहरों में से है। जिस भी कालखण्ड में खोजें, बनारस का जिक्र और अस्तित्व मिल जाता है। दुनिया में ऐसा दूसरा शहर दमिश्क है, लेकिन दमिश्क इन दिनों तहस-नहस है। उसे उन लोगों ने बरबाद कर डाला, जो यह समझते हैं कि वे असली इस्लामी राज्य ला रहे हैं। वह अब शहर नहीं, एक खंडहर है।


साहित्यकार प्रियदर्शन कहते हैं कि आज के दमिश्क के साथ आज के बनारस की तुलना नहीं की जा सकती, इस मामले में बनारस सौभाग्यशाली है। हालांकि यहां भी एक तरह का सांस्कृतिक ध्वंस जारी है। दरअसल यह ध्वंस पूरे भारत और पूरी भारतीयता का ध्वंस है, जिसे बनारस के विश्वनाथ मंदिर के बदलाव में ठोस ढंग से पहचाना जा सकता है। यह मंदिर अब पुरानी सहज आस्था का केंद्र नहीं, सैलानी आस्था का ठिकाना बन रहा है, जिसका एक बड़ा आकर्षण इसकी भव्यता होगी। यहां घूमने की आसानी है, यहां कर्मकांड की सरलता है। जो एक जीवंत अतीत था, जो मंदिर की संकरी गलियों में सांस लेता था, अब वह बेजान तस्वीरों, झांकियों और अभिलेखों का हिस्सा है। लोग उसे जान तो लेंगे, लेकिन अब महसूस नहीं कर पाएंगे। उनके पांवों के नीचे जो ज़मीन होगी, उसमें सदियों से पड़ रहे पदचापों का कंपन नहीं होगा, उसमें वह स्पंदन नहीं होगा जो बनारस को पहले शिव के पांव की धूल बनाता है और फिर धूल-धूल में बनारस को बसाता है।


मुझे लगता है कि सदियों पुराने मंदिरों और स्थापत्यों को बहुत सावधानी से हाथ लगाना चाहिए। उनमें उनकी आत्मा बसी होती है, उनमें उनकी ख़ुशबू बोलती होती है। आप उन्हें छूते हैं, और जादू ख़त्म हो जाता है। भव्य मंदिरों में बस भव्य मूर्तियां ही रह जाती हैं, देवता तो चुपचाप निकल जाते हैं। प्रोफ़ेसर, लेखक और संस्कृतिधर्मी आशुतोष कुमार कहते हैं कि लोक में बसे शिव को हाथी-घोड़े, शाल-दुशाले, कोठे अटारी से ख़ुश नहीं किया जा सकता। एक तरफ आप यह करते हैं, और दूसरी तरफ शिव गायब हो जाते हैं, मंदिर की जगह बस उसका स्थापत्य रह जाता है, विशाल देवालयों के घंटे-घड़ियालों में एक सन्नाटा बजता रह जाता है। सत्ता, सम्पत्ति, विलास, भव्यता, इनके सामने आते ही शिव की तीसरी आँख खुल जाती है. शंकर को भव्यता मन भाती ही नहीं. वे वहाँ एक क्षण नहीं रुकते. वे उन पगडंडियों के किनारे बिखरे कंकर-पत्थरों में लौट जाते हैं, जो भारत के किसानों-मजदूरों को उनके खेतों-कारखानों तक ले जाती हैं.


शिव तो नंदी पर बैठने वाले, मृगछाल ओढ़ने वाले, धतूरा खाकर प्रसन्न रहने वाले देवता हैं। वे दुनिया की परिक्रमा करने वाले कार्तिकेय से प्रसन्न नहीं होते, बस अपने चारों ओर घूम लेने वाले गणेश से खुश हो जाते हैं। जिसकी जटाओं में ही गंगा है, उस गंगाधर तक गंगा का पानी लाने में आसानी हो, इसके लिए बीते चार साल से तोड़फोड़ जारी है।


प्रियदर्शन कहते हैं कि यह हाल केवल वाराणसी ही का नहीं, पूरे भारतवर्ष का है। धर्म से अध्यात्म के तत्व को निकाल दिया गया है, जो उसका प्राण है। अब उसे एक सांगठनिक शक्ति की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमें एक तरह की पाशविकता है। उसे एक आर्थिक व्यापार की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसमें भारी मुनाफ़ा है। भारत के सामने जैसे एक चुनौती उछाल दी गई है कि वह इस हिंदुत्व और इसका वहन करने वाले संगठनों के आगे आत्मसमर्पण कर दे और राजनीति तथा संस्कृति की दी हुई उनकी परिभाषाओं को अंतिम सत्य मान ले। धर्म के नाम पर एक अनवरत प्रलाप जारी है, जिसके निशाने पर ‘विधर्मी’ हैं। यह आक्रामक हिंदुत्ववाद नया नहीं है। यह हमेशा जड़ता को गति मानता है, लकीर को सत्य मानता है। जो लोग खुद को शिव का उपासक और शंकर की परंपरा का वारिस बता रहे हैं, वे मान बैठे हैं कि शिव इस सजावट में ही समाए हुए हैं।


ऐसे ही आक्रामक हिंदूवादियों ने कभी तुलसीदास को रामचरित मानस लिखने से भी रोका था। अपने उपन्यास ‘मानस के हंस’ में अमृतलाल नागर लिखते हैं कि तुलसी अपनी पांडुलिपि बचाते हुए अयोध्या से बनारस और बनारस से अयोध्या भाग रहे थे। इन्हीं पंडितों ने कहा था कि मानस लोकभाषा में नहीं रची जा सकती, रामकथा संस्कृत में ही होनी चाहिए और काशी विश्वनाथ ने आगे बढ़कर उनकी रक्षा की थी। विवेकानंद इस आक्रामक हिंदुत्व को पहचानते थे। वे हिंदुओं के आधिकारिक प्रतिनिधि के रूप में शिकागो के विश्व धर्म सम्मेलन में नहीं गए थे। वहां हिंदू महासभा के प्रतिनिधि के तौर पर कोई और गया था। लेकिन जब ‘भाइयों और बहनों’ के साथ विवेकानंद का वह ऐतिहासिक भाषण यादगार बन गया, तो अचानक वे हिंदू धर्म के पुरोधा हो उठे। बीसवीं सदी के सबसे बड़े हिंदू को तो ये ताकतें सहन नहीं कर सकीं। राम का नाम लेकर जीने और मरने वाले गांधी को इसी विचारधारा ने गोली मार दी।


प्रियदर्शन एक बार फिर शिव पर लौटते हैं। शिव का एक अर्थ कल्याण भी होता है और वह सत्य से मिलकर सुंदर और सार्थक होता है। सत्यम शिवम सुंदरम का दर्शन इस देश में उतना ही पुराना है, जितनी शिव की अवधारणा। दुर्भाग्य से जो लोग शिव के नाम पर विश्वनाथ मंदिर का जीर्णोद्धार कर रहे हैं, वे सत्य के उपासक नहीं हैं। सत्य उन्हें डराता है। शिव, राम या कृष्ण, इस देश की कल्पना हैं, इसका सबसे बडा स्वप्न हैं, यह बात लोहिया ने कही थी। लोहिया की इस बात से संभव है, कुछ असहमति हो, लेकिन इसमें संदेह नहीं कि इस कल्पना में एक तरह की मानवीय काव्यात्मकता है. एक आध्यात्मिक उदात्तता है, जो लोहिया को ‘कुजात गांधीवादी’ बनाती है. ऐसा हिंदू बनाती है, जो राम, कृष्ण और शिव को उनके सुंदर और सकारात्मक रूप में देखना-जीना-पूजना चाहता है। दुर्भाग्य से इस देश में ऐसा हिंदू भी अल्पसंख्यक बना दिया गया है. एक बहुसंख्यक आक्रामकता जैसे उसे जीने न देने पर तुली है, उसकी असहमति को भी कुचल देने पर आमादा है। कहना मुश्किल है कि काशी विश्वनाथ के इस नए गलियारे में बिस्मिल्ला खां की शहनाई की विरासत का क्या होगा!

-प्रेम प्रकाश

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