सुंदर व स्वस्थ त्वचा का राज

स्वास्थ्य

यदि आपके शरीर के भीतर गंदगी है और रक्त अशुद्ध है, तो बाहर से कीमती प्रसाधनों से सौन्दर्य नहीं खिलता। यदि अंदर का रक्त शुद्ध-स्वच्छ है, तो रक्त की वह लालिमा हमारे मुख मंडल को ऐसे ही स्थाई रूप से लाल बना देगी।

स्वस्थ व्यक्ति ही प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ वरदान है। प्रत्येक स्त्री-पुरुष स्वभाव से ही सौन्दर्य प्रिय होता है। काले व मुलायम बाल, चमकीली आंखें, गुलाबी गाल, लाल-लाल होंठ, मोती जैसे दांत, लचीला शरीर, कांतिमय त्वचा, मस्तानी चाल आदि तो स्वास्थ्य के पीछे-पीछे ही चलते हैं। सौन्दर्य का रहस्य है अच्छा स्वास्थ्य और अच्छे स्वास्थ्य का आधार है शरीर की आंतरिक व वाह्य शुद्धि। सौन्दर्य और स्वास्थ्य का परस्पर चोली-दामन का संबंध है। सुंदर कोमल एवं सतेज वही होता है, जो तन-मन से स्वस्थ हो। सुंदरता के लिए उत्तम स्वास्थ्य का होना जरूरी है। हमारा स्वास्थ्य ही हमारी सुंदरता का द्योतक है। बिना स्वास्थ्य के मुख पर सौन्दर्य नहीं आ सकता। यदि आपके शरीर के भीतर गंदगी है और रक्त अशुद्ध है तो बाहर से कीमती प्रसाधनों से सौन्दर्य नहीं खिलता। यदि अंदर का रक्त शुद्ध-स्वच्छ है, तो रक्त की वह लालिमा हमारे मुख मंडल को ऐसे ही स्थाई रूप से लाल बना देगी।

असौन्दर्य के मुख्य कारण
चेहरे पर रक्त-संचार भलीभांति न होने, हर समय त्यौरियां चढ़ाये रखने तथा अधिक समय धूप में रहने से चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाती हैं। आयु के साथ बढ़ने पर बचपन का हंसना, रोना, मुंह चिढ़ाना आदि छूट जाने पर चेहरे की मांस पेशियों का व्यायाम नहीं होता, जिसके फलस्वरूप वृद्धावस्था की झलक चेहरे पर दिखने लगती है। कब्ज के कारण शरीर में विजातीय द्रव्य इकट्ठा होने से त्वचा मलिन होती है और अनेक चर्म रोग होते हैं। मानसिक व शारीरिक तनाव सुंदर त्वचा के शत्रु हैं। अधिक सोचने व चिन्तित रहने से चेहरे पर झाईयां, चकत्ते, कील, मुहांसे आदि निकलने लगते हैं। अयुक्ताहार-विहार तथा निर्जीवाहार से उत्तम रस न बनने पर विषैला रक्त बनता है और विषैले रक्त से त्वचा-रोग होते हैं। अधिक नमक खाना भी कुरूप बनाता है। कृत्रिम प्रसाधनों को प्रयोग में लाने से भी कई भयंकर रोग उत्पन्न हो जाते हैं।

निवारण के लिए युक्ताहार
उत्तम आहार से उत्तम रस, उत्तम रस से उत्तम रक्त और उत्तम रक्त से स्वच्छ रंग प्राप्त होता है। 80 प्रतिशत क्षारीय आहार लें। यथाशक्ति कुछ दिन नींबू-पानी पर उपवास या रसाहार करें। बाद में फलाहार जैसे – संतरा, मौसम्बी, पपीता, सेब, खरबूजा, तरबूज, खजूर, अनन्नास, स्ट्राबेरी आदि मौसमी फल लें तथा साग-सब्जी में खीरा, ककड़ी, पालक, लौकी, गाजर, लेटूस, आंवला, टमाटर, प्याज, बंदगोभी आदि का कच्चा रस या सूप या उबले हुए लें। बाद में अंकुरित अनाज तथा भिंगोकर सूखे मेवे व फल-दूध लेते रहें। सुधार होने पर उपरोक्त खाद्यों के अतिरिक्त धीरे-धीरे ही उबली साग-सब्जी, सलाद, मट्ठा व चोकर समेत आटे की रोटी पर आयें। केसर और इलायची को दूध में उबालकर पीयें। गाजर, टमाटर, संतरा, चुकंदर, इन सबका 2-2 तोला रस निरंतर दो मास तक सेवन करने से चेहरे की झाइयां, दाग, मुहांसे आदि दूर होकर चेहरा सुंदर और साफ हो जाता है।

प्राकृतिक सौन्दर्य साधन
सूर्योदय से पहले एक गिलास पानी में नींबू-रस मिलाकर पीयें। उपवास व रसाहार में या शौच ठीक न आने पर एनिमा लें। प्रात: नित्य भ्रमण व प्राणायाम, वायु व लघु सूर्य स्नान के बाद सप्ताह में 1-2 बार धूप में तेल मालिश करें। स्नान से पहले दोनों हाथों से पूरे चेहरे की सूखी मालिश के बाद मुल्तानी मिट्टी या नींबू रस या बेसन लगाकर ठंडे जल से स्नान करें। सप्ताह में 2-3 बार चेहरे का वाष्प स्नान 5-10 मिनट के लिए लें। जब भी अवसर मिले, मुस्कुराइये तथा खिलखिलाकर हंसिये। यथाशक्ति बंध सहित भस्त्रिका प्राणायाम, सूर्य नमस्कार, शंख प्रक्षालन, सर्वांगासन, मत्स्य, विपरीत करणी मुद्रा, हलासन, सिंहासन, योगमुद्रा, सुप्तवज्रासन आदि करें। चलते फिरते, बैठते-खड़े होते, लेते हर समय मेरुदण्ड सीधा रखें। मिट्टी व जलोपचार आदि प्राकृतिक साधनों से सारे शरीर को दोषमुक्त करें।

चेहरे के व्यायाम
सीधा खड़े होकर दोनों अंगूठों को कानों में डालकर बाकी अंगुलियों से नासिकाएं दबाएं। मुंह को कौए की चोंच की तरह बनाकर मुंह से अंदर खींचे। फिर गालें फुलाकर ठोड़ी को कण्ठकूप में लगाकर सांस अंदर ही रोक रखें। बाद में गर्दन ऊपर उठाकर, अंगुलियां हटाकर, नासिकाओं से सांस बाहर निकाल दें। ऐसा 3-4 बार करें। मुंह में हवा भर कर गालों को फुलायें। ऐसा 10-15 बार करें। प्रात: अपने गालों को अंगुलियों से पकड़कर धीरे-धीरे खींचे। बाद में 8-10 मिनट उन पर हल्की-हल्की सूखी मालिश करें। रात को सोने से पहले 5-7 मिनट चेहरे की सूखी मालिश करें। दिन को मुंह धोने के पश्चात उसे तौलिये से न रगड़ें, बल्कि धीरे-धीरे हाथों से थपथपा कर या मल-मल कर सुखाएं। मुंह पूरी तरह खोलकर और उसे बिना बंद किये – ‘ओह-आह’ का इस तरह उच्चारण करें कि आवाज न निकले। इस तरह सामने, ऊपर और नीचे देखते हुए अधिक से अधिक बार करें।

-‘प्राकृतिक चिकित्सा सामान्य ज्ञान’ से

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