अमृत काल के पचहत्तर तालाब बनाम असि-एक नदी

अभी सरकार द्वारा आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है, जिसके तहत प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 75 नए तालाब खोदे और बनाये जाने का शंखनाद हुआ है। दूसरी तरफ असि नदी को उसकी तलहटी तक पाटा और बेचा जा रहा है। खुल्लम खुल्ला उसकी कोख में पत्थर डालकर इमारतें तानने की कवायद चल रही है। और इन सारी कवायदों को वाराणसी प्रशासन ने मौन स्वीकृति दे रखी है।

सिर काट के बाल की रक्षा करना, यह कहावत तो सुनी ही होगी आपने। मायने यह कि किसी की गर्दन काट दीजिये और उसके सिर को हाथ में थाम के बालों में शैम्पू लगाइये कि कहीं डैंड्रफ न हो जाये। यकीन मानिए, ऐसा ही हो रहा है दुनिया की प्राचीनतम नगरी काशी और दुनिया के विशालतम लोकतंत्र भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में। आइए, बताते हैं कि हम ऐसा क्यों कह रहे हैं!

हम लोग उस परम्परा के संवाहक हैं, जहां भूख से सड़क किनारे दम तोड़कर मर जाने वाले देश के निरीह नागरिक की तेरहवीं में भी तेरह सौ लोग भोजन करते हैं। क्यों? क्योंकि हम लोग उत्सवधर्मी लोग हैं, दिखावा-पसंद लोग हैं। अब जब हम दिखावा-पसंद हैं, तो हमारी चुनी हुई सरकार का क्या हाल होगा? देख लीजिए, हमारी सरकार भी बारहों महीने, चौबीसों घंटे रंगमंच सजाये रहती है। कौन जाने, कौन सा डायलॉग कब फेमस हो जाये और पोलिटिकल टीआरपी में भूचालकारी उछाल आ जाये। लगभग ऐसा ही कुछ चल रहा हम सबकी काशी, उनके वाराणसी और मेरे बनारस में।

अभी सरकार द्वारा आजादी का अमृत महोत्सव मनाया जा रहा है, जिसके तहत प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में 75 नए तालाब खोदे और बनाये जाने का शंखनाद हुआ है। बाद में जिलाधिकारी महोदय को पता नहीं कहाँ से ब्रह्मज्ञान मिल गया और प्रस्ताव में संशोधन हुआ कि 75 नए तालाब नहीं, बल्कि 75 पुराने तालाबों को संरक्षित कर पुनर्जीवित किया जाएगा। ये तालाब शहर की फिजां बदल देंगे। अब फिजां बदले या न बदले, कुछ नेताओं, कुछ अधिकारियों और कुछ व्यवसायियों के चेहरे तो ऐसे खिल गए हैं, मानो मेले में बिछड़ा हुआ भाई बरसों बाद मिल गया हो।
वाराणसी में वर्तमान में तीन नदियां हैं- गंगा, वरुणा, और असि। वरुणा और असि के हालात रुलाने वाले हैं। वरुणा तो फिर भी थोड़ी नदी की शक्ल में बची हुई है, असि तो इस शहर का सीवर ढो-ढोकर थकी हारी हालत में नाला होने की गाली सुन रही है। वैज्ञानिक तथ्य यह है कि असि का सम्पूर्ण उद्धार सम्भव है, लेकिन हालत यह है कि आज भी असि को उसकी तलहटी तक पाटा और बेचा जा रहा है। खुल्लम खुल्ला उसकी कोख में पत्थर डालकर इमारतें तानने की कवायद चल रही है। और इन सारी कवायदों को वाराणसी प्रशासन ने मौन स्वीकृति दे रखी है।

असि नदी

प्रश्न यह है कि बोले भी तो कैसे? जब उमा भारती जैसी कद्दावर नेता से सम्बद्ध उडुपि नाम का मठ असि-गंगा संगम के मुहाने पर तना हुआ है। बाकी भूमिगत रहकर नदी निगलने का माद्दा रखने वाले नेताओं और अधिकारियों की कोई कमी तो हैं नहीं देश में। फलतः असि सिकुड़ती जा रही है,दम तोड़ती जा रही है। एक तरफ एक जीती जागती नदी है, जिसको इच्छाशक्ति हो तो आज भी बचाया जा सकता है, लेकिन उसे पाटने और बेचने की खुली छूट है. ऐसे में पचहत्तर तालाबों को सजाने की कवायद का अर्थ क्या है आखिर? आप खुद सोचिये कि ये सिर काटकर बाल की रक्षा करने सरीखा मामला है या नहीं?

आजादी के बाद बने सारे प्रधानमंत्रियों की कुल मिलाकर अब तक वाराणसी की उतनी यात्राएं नहीं हुई होंगी, जितनी बार अकेले वर्तमान प्रधानमन्त्री पिछले आठ वर्षों में यहां आ चुके हैं। प्रधानमंत्री का संसदीय क्षेत्र होना भी इसका एक कारण है। प्रधानमंत्री कहते हैं कि हमें तो माँ गंगा ने बुलाया है! गंगा को वे माँ कहते हैं, फिर मौसी से इतनी नफरत क्यों रखते हैं, पता नहीं। जब वे आते हैं तो उनकी मौसी असि त्रिपाल से ढक दी जाती है कि कहीं उसके शरीर की दुर्गन्ध से वे विचलित न हो जाएं। शायद उन्हें बताया भी नही जाता कि यही हैं आपकी मौसी, जो अपने उद्धार के लिए तड़प रही हैं. काश! एक बार उनसे भी मिल लेते, यद्यपि गंगा की तरह गोता तो नहीं लगा पाएंगे।

असि बचाओ संघर्ष समिति के माध्यम से हमने प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी असि दर्शन का न्योता दिया था. मुख्यमंत्री अक्सर रात-बिरात ही वाराणसी आते रहते हैं, कभी तो चुपके से आकर असि से भी मिल लेते, लेकिन आजतक यह अभिलाषा पूरी नहीं हुई। यकीन मानिए, अगर असि के किनारे खाली पड़ी हरित पट्टी की जमीनों को ईमानदारी से खाली कराके उसका सुंदरीकरण करके, असि के पौराणिक और पर्यावरणीय महत्व को शिलालेखों पर लगा कर असि के पुनर्जीवन का कार्य शुरू किया जाये, तो काशी के समाज की एक ऐतिहासिक, एक पुरातात्विक, एक पौराणिक धरोहर बचेगी, पर्यटन बढ़ेगा, जलस्तर सुधरेगा. सबसे बड़ी बात कि असि खिलखिलायेगी और सरकारी योजना के पचहत्तर तालाबों पर अकेली भारी पड़ेगी।

फैसला सरकार के हाथ में है कि असि को बचाकर अपना नाम इतिहास में अंकित कराना है या इतिहास से असि के एक पन्ने को हमेशा हमेशा के लिए गायब कर देना है। और हाँ, सनद रहे कि अगर असि नहीं बची तो एक छोर पर वरुणा और दूसरे छोर पर असि वाले शहर वाराणसी का नाम भी बदलना पड़ेगा। फिर भला आप उसको वाराणसी कैसे कहेंगे?

-गणेश शंकर चतुर्वेदी

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