प्लानिंग फॉर सर्वोदय : नव गांधीवाद की बाइबिल

सर्व सेवा संघ ने 30 जनवरी 1955 को सर्वोदय तथा सर्वोदयी सामाजिक व्यवस्था के तरीकों और कार्यक्रमों को समझाने के लिए ‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ प्रकाशित की थी। प्लानिंग फॉर सर्वोदय की रचना के लिए गठित सर्वोदय योजना समिति के सदस्यों में धीरेन्द्र मजूमदार, जयप्रकाश नारायण, अन्ना साहब सहस्रबुद्धे, आरएस धोत्रे, सिद्धराज ढड्ढा, अच्युत पटवर्धन, रवीन्द्र वर्मा, नारायण देसाई तथा शंकरराव देव थे। शंकरराव देव इस समिति के संयोजक थे।’प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ नव गांधीवाद की बाइबिल है। इसमें भावी समाज के स्वरूप की कल्पना की गयी है, जिसमें प्रेम सर्वोपरि है और जिसमें सभी का भला समाहित है।

महात्मा गांधी ने ‘सर्वोदय’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग सन 1908 में जॉन रस्किन की पुस्तक अन्टू दिस लास्ट के गुजराती अनुवाद के शीर्षक में किया था। तब से यह शब्द गांधीवादी साहित्य में यत्र-तत्र दृष्टिगत होता है। धीरे-धीरे यह शब्द गांधीवाद का प्रतिरूप हो गया।

‘सर्वोदय’ विश्व की समस्याओं तथा भौतिकवादी जगत एवं आधुनिकता की बुराइयों के समाधान के लिए एक गांधीवादी नुस्खा है। ‘सर्वोदय’ का शाब्दिक अर्थ है ‘सबका कल्याण’। ‘सबका कल्याण’ की भावना से प्रेरित ‘सर्वोदय’ एक आदर्श सामाजिक व्यवस्था की अभिव्यक्ति है, जिसका आधार प्रेम है। यही प्रेम सर्वोदय आंदोलन की पृष्ठभूमि में रहा है। इसी आदर्श को गांधी जी के आश्रमवासी अनुयायियों ने अपनाया, जिनमें विनोबा भावे प्रमुख थे।


सन 1948 में महात्मा गांधी की मृत्यु के पश्चात उनके सर्वोदयी आदर्श को जीवित रखने के लिए अपने संकल्प की दृढ़ता से प्रेरित होकर 30 जनवरी 1950 को सर्वोदय नियोजन समिति ने सर्वोदय योजना के सिद्धांतों को राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत किया। इन सिद्धांतों को विनोबा भावे ने 18 अप्रैल 1951 को भूदान आंदोलन को प्रारंभ करके कार्यरूप में परिणत किया था। भूदान ने सर्वोदय को आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया,जिसके आदर्श गांधी जी थे। इन सफलताओं को देखते हुए सर्व सेवा संघ ने 30 जनवरी 1955 को सर्वोदय तथा सर्वोदयी सामाजिक व्यवस्था के तरीकों और कार्यक्रमों को समझाने के लिए ‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ प्रकाशित की थी। प्लानिंग फॉर सर्वोदय की रचना के लिए गठित सर्वोदय योजना समिति के सदस्यों में धीरेन्द्र मजूमदार, जयप्रकाश नारायण, अन्ना साहब सहस्रबुद्धे, आरएस धोत्रे, सिद्धराज ढड्ढा, अच्युत पटवर्धन, रवीन्द्र वर्मा, नारायण देसाई तथा शंकरराव देव थे। शंकरराव देव इस समिति के संयोजक थे।’प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ नव गांधीवाद की बाइबिल है। इसमें भावी समाज के स्वरूप की कल्पना की गयी है, जिसमें प्रेम सर्वोपरि है और जिसमें सभी का भला समाहित है।

‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ दो भागों में विभक्त है। प्रथम भाग में नीति निर्धारकों ने भावी समाज के स्वरूप तथा आर्थिक ढांचे पर विहंगम दृष्टि डाली है। दूसरा भाग 15 अध्यायों में विभक्त है। इनमें सर्वोदय समाज की योजना के उद्देश्य, कृषि, पशुपालन, उद्योग, मशीन, ऊर्जा, औद्योगिक शोध, बैंकिंग, मुद्रा, बीमा, व्यापार, यातायात, श्रम, औद्योगिक संबंध, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता, प्रतिरक्षा, कराधान, नियोजन का वित्त प्रबंधन तथा संपूर्ण योजना के कार्यान्वयन के तरीके शामिल हैं। सर्वोदय के नीति निर्धारकों ने सरकारी पंचवर्षीय योजना से भिन्न निम्नलिखित नियोजन राष्ट्र के समक्ष प्रस्तुत किया।

सर्वोदयी नियोजक अपने आदर्श की काल्पनिक प्रवृत्ति को समझाते थे। वे यह जानते थे कि ऐसा आदर्शवादी चित्र प्रस्तुत करने के लिए उन पर काल्पनिक होने का आरोप लगेगा। सर्वोदयी नियोजकों ने अपील की थी कि जो भी विचार ‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ में अभिव्यक्त किये गये हैं, यदि वे स्वप्न की भांति भी हों तब भी व्यक्ति इस स्वप्न को पूरा करने का गंभीर प्रयास करेगा।

इस आदर्श समाज को किस प्रकार प्राप्त किया जायेगा, इसके लिए सर्वोदय नियोजकों ने एक परिवर्तन काल की योजना की कल्पना की थी। इस प्रकार के समाज की प्राप्ति के लिए राजनीतिक सत्ता के विघटन तथा उत्पादन एवं वितरण की प्रक्रिया के विकेन्द्रीकरण में सर्वोदयी नियोजक विश्वास करते थे।

गांव एक बुनियादी इकाई तथा इस संरचना की धुरी होगा। सर्वोदयी नियोजकों का मानना था कि उनकी योजना गांवों में ग्राम समुदाय द्वारा कार्यरूप में परिणत होगी।

यह इकाई अपने आप में आत्मनिर्भर तथा आत्मनियमित होगी। ऐसी व्यवस्था में पूर्ण तथा समग्र रोजगार संभव होगा। आर्थिक संगठन श्रम प्रधान होगा न कि पूंजी प्रधान। चूंकि इस प्रकार के आर्थिक संगठन में केवल सीमित मात्रा में उत्पादन होगा तो ऐसी दशा में श्रमिक अपने औजार का ही प्रयोग करेगा। सर्वोदयी आर्थिक व्यवस्था में उत्पादन उपभोग के लिए होगा, न कि वाणिज्य के लिए। वाणिज्य पूर्ण रूप से निषेधित नहीं होगा। इस नये समाज की मुख्य विशेषता सहयोग होगी न कि प्रतिस्पर्धा। उद्योग तीन क्षेत्रों में संगठित होगा – स्व रोजगार, सहकारिता तथा सामाजिक। यांत्रिकी तथा तकनीकी प्रगति का उपयोग मनुष्य की कार्यक्षमता बढ़ाने के लिए तथा उसे मशीनी दासता से बचाने के लिए किया जायेगा।साथ ही इस प्रगति से व्यक्ति अपने शेष बचे हुए घंटों का उपयोग स्वयं के नैतिक तथा सांस्कृतिक उत्थान पर करेगा, जो उसके जीवन को सार्थकता प्रदान कर सकेगा।


सर्वोदयी अर्थव्यवस्था में मौलिक, औद्योगिक तथा तकनीकी शोध को प्रोत्साहन दिया जायेगा। ऊर्जा संसाधनों, यातायात और संचार के साधनों में सुधार संभव होगा। इस प्रकार प्रत्येक क्षेत्र में प्रगति सर्वोदयी समाज के बुनियादी सिद्धांत ‘सबके कल्याण’ के अनुकूल होगी। ‘सबके कल्याण’ के उद्देश्य की प्राप्ति के लिए हर संभव प्रयास किये जायेंगे। जमींदारों और पूंजीपतियों को ऐसा कार्य नहीं करने दिया जायेगा, जिससे समाज की प्रगति में बाधा उत्पन्न हो। यदि वे समाज की प्रगति में बाधा डालेंगे तो उनका अंत किया जायेगा और उसके बदले में उन्हें वैकल्पिक रोजगार या पुनर्वास मुआवजा दिया जायेगा। इन सब स्थितियों के लिए एक नये व्यक्ति की आवश्यकता होगी। कारण, व्यक्ति ही सर्वोदयी व्यवस्था का केन्द्र बिन्दु होगा। सर्वोदयी समाज या परिवर्तन काल के व्यक्ति का एक नया दर्शन और दृष्टिकोण होगा। इस प्रकार सर्वोदय उस आर्थिक और राजनीतिक पद्धति, जो समानता और न्याय पर आधारित है, से कहीं अधिक श्रेष्ठ है। ‘यह जीवन का एक तरीका है, सत्य, प्रेम तथा अहिंसा के शाश्वत सिद्धांतों के आधार पर समाज के जीवन को निर्धारित करने का मार्ग है।

सर्वोदय मूलत: गांधीवादी विचारधारा है। गांधीवाद का मौलिक स्वरूप ‘हिन्द स्वराज’ में मिलता है और महात्मा गांधी इस कृति में अभिव्यक्त अपने विचारों पर जीवनपर्यंत अडिग रहे। सर्वोदय तथा सर्वोदयी समाज के स्वरूप को समझने के लिए ‘हिन्द स्वराज’ तथा ‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ का तुलनात्मक अध्ययन करना आवश्यक होगा।

इन दोनों कृतियों के क्रमबद्ध अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि दोनों में अभिव्यक्त विचार शत-प्रतिशत एक जैसे नहीं हैं। ‘हिन्द स्वराज’ आधुनिकता के प्रति एकदम नकारात्मक दृष्टिकोण प्रकट करती है, जबकि ‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ आधुनिकता के प्रति सकारात्मक तथा गांधीवाद के परिष्कृत रूप की अभिव्यक्ति है।

‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ में दिए गये सर्वोदयी समाज के आर्थिक नियोजन के कार्यक्रमों के अध्ययन से विदित होता है कि गांधीवाद में अनेक रूपांतरण हुए हैं, जो विश्वसनीय नहीं लगते हैं। संसद, रेलवे, अस्पताल तथा मशीन के संबंध में ‘हिन्द स्वराज’ में अभिव्यक्त नकारात्मक विचार ढल गये हैं। आधुनिकता का कठोर विरोध भी ढल गया है। वैसे ही रामराज्य के आधार पर ग्रामीणीकरण की पुरानी धारणा के दिन भी ढल गये हैं। आश्रम जीवन की सादगी व इच्छाओं की कटौती भी ढल गयी है। अब ‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ का नवीन गांधीवाद विज्ञान, मशीन, बुद्धिवाद तथा पश्चिमी सभ्यता के पुरस्कारों को स्वीकार करता है।


आलोचक यह भी कह सकते हैं कि ‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ में कुछ भी गांधीवाद नहीं रह गया है, केवल इस दस्तावेज के शीर्षक को छोड़कर। परंतु यह आलोचना सतही है। इसमें कोई गहराई नहीं है। यदि ‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ का गहराई से अध्ययन किया जाए तो यह मूलत: गांधीवादी है। सर्वोदयी नियोजक यथार्थ के प्रति सचेत थे कि आधुनिक मशीन आरंभ हो चुकी है और यह अस्तित्व में रहेगी। वे उसका उपयोग मानव सुविधाओं को बढ़ाने के लिए करना चाहते थे, न कि मानव जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए। मशीन को आधुनिक परिस्थिति में सीमित एवं प्रतिबंधित रूप में स्वीकार करना ही गांधीवादी पद्धति थी। मशीनी सभ्यता में प्रगति केवल सुविधा बढ़ाने के लिए दी जानी चाहिए तथा यह सुविधा उत्पादकों को भी दी जानी चाहिए, न कि उत्पादन में क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए। सर्वोदय नियोजक इससे भलीभाँति परिचित थे कि अत्यधिक उत्पादन में श्रमिकों का शोषण होगा। सर्वोदयी नियोजक जापान के छोटे पैमाने के यांत्रिकी उद्योग, जल विद्युत पैदा करने वाले छोटे संयंत्र तथा मोटर परिवहन के लिए स्थानीय खनिज तेल के प्रयोग के उदाहरण से प्रभावित थे।

‘हिन्द स्वराज’ और ‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ का अध्ययन करने से ऐसा विदित होता है कि सर्वोदय नियोजकों ने गांधीवाद को सचेत रूप से स्वीकारा था। यह सर्वोदय का अाधिकारिक स्वरूप था। अनाधिकारिक रूप से विनोबा और उनके अनुयायी प्राय: कुछ विषयों में ‘हिन्द स्वराज’ के नकारात्मक दृष्टिकोण को मानने वाले लगते थे। जहां तक सर्वोदय आंदोलन की राजनीति का प्रश्न है, इसमें और गांधीवादी आंदोलन में एकरूपता थी। यह पूर्ण रूप से गांधीवादी ‘सहयोग, सुलह (अभिमत), प्रेम तथा सामान्य हित के विचार से परिपूर्ण है।

सर्वोदय गांधीवाद की भांति एक अहिंसक आंदोलन था, जिसका आधार प्रेम था। सर्वोदय का नीतिशास्त्र संबंधी पहलू मूलत: भारतीय है, जिसका उद्देश्य मुक्ति, निर्वाण या मोक्ष है। इसे प्राप्त करने के मार्ग हैं – यज्ञ, दान और तप, जो गीता में उल्लिखित हैं। विनोबा मानते थे कि इनके ही माध्यम से सर्वोदयी आदर्श संभव होगा। ये तीनों ही मार्ग वास्तव में सर्वोदयी समाज के नागरिक की आवश्यक और बुनियादी विशेषता थी। तभी तो ‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ के रचयिताओं की यह आशा थी कि भारतीय सदाचार की ये तीन आवश्यक विशेषताएं (यज्ञ, ज्ञान और तप) ही उनकी योजना को सफल बनायेगी। उनका कहना था कि ‘हम इस दृष्टि से भाग्यशाली हैं कि हमारी सभ्यता सदैव बाह्य विकास के बजाय आंतरिक विकास पर जोर देती है तथा उन मूल्यों को विशेष स्थान देती आयी है, जो सदैव नैतिक एवं आध्यात्मिक रहे हैं।


इन तीन विशेषताओं के अतिरिक्त सर्वोदयी अपरिग्रह पर जोर देते रहे हैं।संक्षेप में यह कह सकते हैं कि ‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ में गांधीवाद के आदर्शवादी स्वरूप की अक्षरश: अभिव्यक्ति नहीं मिलती है। इसका कारण भी है कि समय के साथसाथ विश्व में किसी भी विचारधारा में परिवर्तन और संशोधन हुए हैं। ठीक उसी प्रकार यह किताब स्वतंत्रता पूर्व के गांधीवाद से पृथक दृष्टिकोण प्रकट करती है। यही बात सर्वोदय की अवधारणा के संबंध में भी दृष्टिगत होती है। सर्वोदय प्रारंभ में आधुनिकता विरोधी आंदोलन था। परंतु समय के साथ इसमें कुछ परिवर्तन आये और आधुनिकता को अपनाने में इसने कुछ सतर्कता बरती। यह सर्वोदय आंदोलन के मुखपत्र ‘प्लानिंग फॉर सर्वोदय’ का सूक्ष्म अध्ययन करने से विदित होता है। इस मुखपत्र पर जयप्रकाश नारायण तथा अच्युत पटवर्धन के विचारों की स्पष्ट छाप दृष्टिगत होती है।

विकासशील अर्थव्यवस्था की स्थिति में विनोबा और जयप्रकाश नारायण के सर्वोदय ने कुछ युवाओं को अवश्य आकर्षित किया था। उनके भूदान एवं सम्पत्ति दान में भूपतियों एवं धनी व्यक्तियों ने अवश्य ही भूमि का दान किया था, परंतु उन्होंने जो भूमि दान की थी, वह ऊसर थी। इसमें विनोबा के भूदान आंदोलन का कोई दोष नहीं था। वे तो प्राचीन भारतीय युक्ति ‘सर्व भूमि गोपाल की’ के अनुसार चाहते थे कि धनी भूपति अपने भूभाग का एक हिस्सा निर्धन भूमिहीन किसान को दे दे। परंतु जमींदारों और भूपतियों की मनोवृत्ति में दोष था कि वे ऐसा न कर सके।

वैज्ञानिक प्रगति और अत्यधिक औद्योगीकरण के युग में अधिकांश युवाओं को विनोबा- जय प्रकाश नारायण की सर्वोदयी विचारधारा काल्पनिक लगती है। परंतु सर्वोदयी विचारधारा को सुगमता से काल्पनिक कह के अस्वीकार नहीं किया जा सकता है। सर्वोदय भौतिकवादी जगत में व्यक्ति की नैतिक और आध्यात्मिक श्रेष्ठता की याद ताजा करता है।

-प्रोफेसर आभा नवनी

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