अफगानिस्तान : अमेरिका की मजबूरी या नई चाल

अंतरराष्ट्रीय मीडिया की इस बात के लिए तारीफ करनी पड़ेगी कि उसने तालिबान को सत्ता में आने देने और लोगों को एक जुल्मी सरकार के सामने बेबस छोड़ने के लिए अमेरिका की तीखी आलोचना की है। अमेरिका ने इस मुल्क को फिर से आतंकवाद और कट्टरपंथ के जबड़े में धकेल दिया है। सच्चाई यह है कि अमेरिका और नाटो ने आतंकवाद के खात्मे का नाटक करते-करते इसे जिंदा रखने का पक्का इंतजाम कर दिया है। यही नहीं दुनिया की दो अन्य बड़ी शक्तियां, चीन और रूस भी अपनी-अपनी जरूरतों के हिसाब से इस खेल में शामिल हैं। सवाल उठता है कि क्या अमेरिका तथा पश्चिम की सदारत में चलने वाली विश्व-अर्थव्यवस्था के लिए आतंकवाद और कट्टरपंथ को जिंदा रखने के अलावा कोई रास्ता नहीं है? क्या अफगानिस्तान की महत्वपूर्ण भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाने और धरती के भीतर दबी खनिज संपदा को लूटने के लिए दुनिया के अमीर देश वहां वैसा ही खूनी खेल खेलने की तैयारी कर रहे हैं, जैसा उन्होंने तेल के भंडारों वाले देशों में खेला है?


यह सभी जानते हैं कि अमेरिका ने पाकिस्तान के जरिये सोवियत रूस के खिलाफ लड़ने वाले उग्रपंथी तैयार किए थे, जिससे तालिबान पैदा हुआ। वल्र्ड ट्रेड सेंटर पर हमले के बाद उसने उसके खिलाफ कार्रवाई की। लेकिन पाकिस्तान उसकी मदद करता रहा। अमेरिका ने ही अल कायदा को पैदा किया और फिर उसका खात्मा किया। इसी तरह उसने इस्लामिक स्टेट (आईएसआईएस) को पैदा किया और उसे खत्म किया। अब अलकायदा और आईएस की कमर तोड़ दी गई तो तालिबान को उसने फिर से जिंदा करने का इंतजाम किया है। जाहिर है कि दुनिया के सारे आतंकवादी संगठन जश्न मना रहे हैं और नई जिंदगी की ओर बढ़ रहा अफगानी समाज, बेचैन और बदहवास है। उधर अमेरिका दुनिया को यह बताने में जुटा है कि तालिबान बदल गया है। वह यह भी बता रहा है कि अफगानिस्तान को गृहयुद्ध से बचाने के लिए इस कथित सुधरे तालिबान को स्वीकार करने के अलावा कोई चारा नहीं है।


पिछले 20 वर्षों से अफगानी जनता तालिबान के हमले झेलती रही है। उसने हजारों लोगों की कुर्बानी दी है। खौफ और दहशत के बीच भी वहां की औरतें और वहां के नौजवान एक आधुनिक समाज बनाने की कोशिश कर रहे थे। देश में विकास तथा मानवीय मदद के लिए जो संसाधन वहां आ रहे थे, उसके सहारे वे आगे बढ़ना चाहते थे। अफगानी जनता की इस जद्दोजहद को अंतरराष्ट्रीय मीडिया इस तरह दिखा रहा है, जैसे यह सिर्फ और सिर्फ अमेरिकी तथा पश्चिमी देशों की देन है। असल में, यह अमेरिका की आधी-अधूरी पहल थी, जिसे अफगानी समाज ने तिनके की तरह पकड़ लिया था और आगे बढ़ने की कोशिश में लगे थे। महिलाएं इसमें सबसे आगे थीं। लेकिन इन देशों ने वही किया, जो उपनिवेशवाद का चरित्र है। वह कभी भी लोकतंत्र और आधुनिकता का पूरा रास्ता तय नहीं करने देता है। अंग्रेजों ने हमारे साथ वही किया और अमेरिका ने अफगानिस्तान में उसी को दोहराया है।


अशरफ गनी के भाग जाने तथा तालिबान से तीन गुना बड़ी अफगानी फौज के धाराशायी होने की कहानी में अमेरिका की नीयत छिपी है। अमेरिका ने वहां ऐेसी फौज तैयार की थी, जो अमेरिकी वायुसेना के बिना एक कदम आगे नहीं बढ़ सकती थी। इसके निकलते ही यह फौज धाराशायी हो गई। अमेरिका ने वहां ऐसा शासन खड़ा किया, जिसका मुखिया अपने लोगों को मंझधार में छोड़ कर भाग गया। उसने एक ऐसी सरकार बनाए रखी, जिस पर चुनावों में धांधली तथा भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। वह एक कमजोर लोकतंत्र चाहता था, जिसका इस्तेमाल मनचाहे ढंग से किया जा सके। यही नहीं, अमेरिका ने तालिबान से समझौता किया और चुनी सरकार की रही-सही साख भी खत्म कर दी। इन समझौतों में अमेरिका ने तालिबान पर युद्ध विराम या हथियार से सत्ता पर कब्जा नहीं करने की कोई शर्त नहीं रखी। उसने तालिबान को सत्ता पर कब्जा करने की अलिखित अनुमति दे दी। लेकिन इस घटना ने एक बार फिर अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान के चेहरे को समाने ला दिया है। अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने भी सच्चाई बयान कर दी है कि उनका देश वहां राष्ट्र-निर्माण के लिए नहीं था। यह एक बेशर्मी से भरा बयान है। आतंक से युद्ध करने के नाम पर २० साल तक उनकी धरती का इस्तेमाल करने के बाद अमेरिका ने तालिबान को लाकर बिठा दिया है और अब वहां हो रहे मानवाधिकारों के उल्लंघन को खामोश होकर देख रहा है।


लेकिन कट्टरपंथ और लोकतंत्र विरोधी तालिबान के खिलाफ वहीं के लोग आवाज उठा रहे हैं। कुछ लोग तो मुल्क छोड़कर अपना विरोध दर्ज करा रहे हैं और बाकी वहीं रह कर प्रतिरोध में खड़े हो गये हैं। पुरुषवादी दुनिया भले ही अफगानिस्तान की औरतों के प्रतिरोध को पहचानने के लिए तैयार नहीं हो, वहां की औरतें तालिबान के खिलाफ खड़ी हो गयी हैं। विरोध के पोस्टर लेकर खड़ी औरतों की तस्वीर से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।


देश का १०२ वां आजादी दिवस मनाने के लिए १९ अगस्त को कई शहरों में भीड़ उमड़ आयी और उसने जगह-जगह तालिबान का झंडा उतार कर तीन रंगों वाला झंडा लगा दिया। इसे लेकर कई जगह हिंसा भी हुई। यह झंडा १९१९ में अफगानिस्तान द्वारा ब्रिटिश संरक्षण से मुक्त होने के बाद अपनाया गया था। तत्कालीन शासक अमानुल्ला खान ने इसके बाद १९२३ में नया संविधान भी लागू किया था, जिसमें औरतों को शिक्षा पाने का हक दिया गया था और अल्पसंख्यकों को पूरी कानूनी सुरक्षा दी गयी थी। यह एक उदार संविधान था। ब्रिटिश साम्राज्य के उत्कर्ष के उस काल में अफगानिस्तान ने न केवल अपने को ब्रिटिश संरक्षण से मुक्त किया, बल्कि उसकी मदद के बगैर अपने यहा संविधान का राज स्थापित किया और कानूनी सुधार भी किये। जनता ने खौफ के इस दौर में राष्ट्रीय गौरव का प्रदर्शन कर यह साबित किया है कि शांति स्थापना के नाम पर तालिबान को स्वीकार करा लेने की पश्चिमी देशों की कोशिश कामयाब नहीं होगी।

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